Wednesday, December 23, 2009

क्या उसकी राह देखना वो जो गया, गया ।

क्या उसकी राह देखना वो जो गया, गया ।
हमसे न जाने कितनी दफा ये कहा गया।

उकसा गया था कोई सियासत की आंधियां,
उढ़कर किसी की आँख में तिनका चला गया।

जिसके लिए थे जाम,शाम, सारी रौनकें ,
वो ही हमारी बज्म से प्यासा चला गया

ऊंचाइयों से अपने तलक हो गए खफा,
हम पंछियों को शाख का भी आसरा गया।

खामोशियों की कर जो रहा था वकालतें,
आंखों को बोलने का सलीका सिखा गया।

3 comments:

सुलभ सतरंगी said...

उकसा गया था कोई सियासत की आंधियां,
उढ़कर किसी आँख में तिनका चला गया।
..वाह!

खामोशियों की कर जो रहा था वकालतें,
आंखों को बोलने का सलीका सिखा गया।
..बहुत खूब!!

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया गजल है।बधाई।

खामोशियों की कर जो रहा था वकालतें,
आंखों को बोलने का सलीका सिखा गया।

श्रद्धा जैन said...

खामोशियों की कर जो रहा था वकालतें,
आंखों को बोलने का सलीका सिखा गया।

waah kamaal ke sher kahte ho
jaise kisi ne aaram se rumaal par bute kaade ho
likhte rahe
aur jaldi jaldi blog update karen