Wednesday, November 25, 2009

लाख ग़म का भी फिर


लाख ग़म का भी फिर कारवां कुछ नहीं ।
सर पे गिरता हुआ आसमां कुछ नहीं ।
साथ में हों जो माँ की दुआएं अगर,
फिर बड़े से बड़ा इम्तिहां कुछ नहीं ।

1 comment:

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com