Tuesday, September 29, 2009

किसी की तो घर


किसी की तो घर में ही शामो-सहर है।
किसी के लिए बस सफर ही सफर है।

उसे देख पाने की हिम्मत गँवा दी ,
उसे देखने की तड़प इस कदर है ।

ज़मीं से ही बेशक जुडा है वो लेकिन
उसे आसमानों की पूरी खबर है।

अंधेरों का मुझको नहीं खौफ कोई ,
मुझे इन सियासी उजालों का डर है ।

2 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.......भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

भविष्य के लिये ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY
http://sanjaybhaskar.blogspot.com