Sunday, October 4, 2009

गज़ब अल्फाज़ की खुश्बू, अजब




गज़ब अल्फाज़ की खुश्बू, अजब जज़्बात की खुश्बू ।
दिलों में घर बनाती है तुम्हारी बात की खुश्बू ।

तुम्हें जब सोचने लगता हूँ मैं तनहा अकेले में ,
मुझे महसूस होती है तुम्हारे साथ की खुश्बू ।

गिरे थे आँख से, कागज़ पे, आंसू रात भर पैहम,
ग़ज़ल भी दरअसल है बस उसी बरसात की खुशबू
बहुत कमजर्फ है दिन का ज़हन कुछ और समझेगा

कहीं पर दफ़्न कर आना तुम अपनी रात की खुशबू ।

मैं उससे प्यार करता हूँ वो मुझसे प्यार करती है

यहाँ इस बात की खुशबू वहां उस बात की खुशबू ।

1 comment:

अंकित "सफ़र" said...

waah meri jaan............kya ghazal kahi hai
ye sunai nahi tune