Monday, October 5, 2009

कुछ ऐसे भी


कुछ ऐसे भी रस्ता तुझे सताएगा ।
हर इक पत्थर ठोकर बनके आएगा ।

दरया से तुम अपने हक की बात करो,
वरना तुमको कतरों में बहलाएगा ।

वो जिद्दी है बा- खूबी मैं वाकिफ हूँ,
रूठ गया तो फिर से मुझे मनाएगा ।

सबके लिए तू हो जाएगा जब बहरा ।
मेरे दिल की तू तब ही सुन पाएगा ।

शायिर ,आशिक,पागल भी हूँ कम है क्या,
इक इंसा कितने किरदार निभाएगा

3 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सुंदर प्रयास है। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अंकित "सफ़र" said...

बेहतरीन ग़ज़ल
हर शेर लाजवाब है मगर आखिरी शेर ने तो एक जादू सा कर दिया है.

अंकित "सफ़र" said...

इस शेर में
वो जिद्दी है बा- खूबी मैं वाकिफ हूँ,
रूठ गया तो फिर से मुझे बनाएगा ।
."बनाएगा" की जगह "मनायेगा" आएगा.

...और अपनी फोटो को हटा ले पूरा स्क्रीन घेर रही है.