Saturday, October 10, 2009

हुए हाल बद से भी





हुए हाल बद से भी बदतर हमारे ।
मगर झुक ना पाये कभी सर हमारे ।

बिछड़ जाएँ तो फिर मिलें ना मिलें हम
नज़र में लिए जाओ मंज़र हमारे।

ज़मीं से ना कट जाए रिश्ता हमारा
निकलने लगे हैं बहुत पर हमारे।

सलीके ना तय करना चलने के साहिब
सफर कर ना पायेंगे रहबर हमारे।

1 comment:

सुलभ 'सतरंगी' said...

ज़मीं से ना कट जाए रिश्ता हमारा
निकलने लगे हैं बहुत पर हमारे।

सलीके ना तय करना चलने के साहिब
सफर कर ना पायेंगे रहबर हमारे।

yah bhi khub kahi... daad kabul kijiye.